(अ)धर्म

कितने गुनाह करू मैं रब इस धर्म के वास्ते, चलने दे ना मुझे बस खुद के कर्म के रास्ते। एक रास्ता है धर्म का और एक छोटे तर्क का, बढ़ रहा ये भेदभाव सब प्रभाव है इस कर्क का। माना तूने सोचा था कि धर्म एक स्तम्भ होगा, हमारी मानवता का हूबहु प्रतिबिम्ब होगा। पर … Continue reading (अ)धर्म

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तितली और तुम

तुम रंग बिरंगा पहने हो, खुद की कालिख से डरते हो? तुम खुश जो इतना दिखते हो, जो मन चाहे वो करते हो? वर्षों मेहनत करके तुमने उस तितली को पकड़ा था, किस जन्नत की चाह में तुमने उसके पंखों को जकड़ा था? वो दूर आकाश की ऊचाईयों तक उड़ती ही बस जाती थी, तुमको … Continue reading तितली और तुम

तुम्हे क्या बताऊँ

कभी खुद से तो कभी दुसरों से, भागता ही जा रहा हूँ बस। तुम्हे क्या बताऊँ, चलना और कितना? भरे जलधि में नाव के जितना। ना राह दिख रही है ना नज़ारे, दिमाग को धड़कता दिल दिख रहा है बस। तुम्हे क्या बताऊँ, देखना मुझे किसको? घने धुंये में ओझल होते खुदको। ना शोर सुनाई … Continue reading तुम्हे क्या बताऊँ

प्रतिफल

मैं श्वेत रक्त की धारा में सौंदर्य छिड़कने आया हूँ, मैं क्रूर निशा की काया में शोलो सा भड़कने आया हूँ। मैं रुह रौंदता दानव हूँ, मनु-हृदय आंकने आया हूँ। मैं अर्ध बूंद की नमी मात्र से थार सींचने आया हूँ, मैं नग्न त्रिशूल की तेज़ धार से खाई खींचने आया हूँ। मैं पृष्ठ चीरता … Continue reading प्रतिफल

कुल्फी का ठेला

दोपहर का समय था, कच्चे घरों पर रखे छप्पर तबे पे रखी रोटी की तरह तप रहे थे। बूढ़े अंदर इस धूप से बचने के नुस्खे ढूढ़ रहे थे और बच्चे लू को बाहों में भरे गलियों की शैर कर रहे थे। तभी एक कुल्फी का ठेला छोटी - छोटी घंटिया बजाते हुये मिट्टी की … Continue reading कुल्फी का ठेला

कीचड़

दूर दूर तक कीचड़ है, सब और भी उसमे भरते है। एक फूल खिला उस कीचड़ में, सब उस पर ही अब मरते हैं। वो कीचड़ में ही खिलता है, सब इससे भी अब डरते हैं। ऐसा क्या है कीचड़ में जो कीचड़ में ही खिलते तुम? सबके दिल में कीचड़ है, अब कहाँ पे … Continue reading कीचड़

लड़खड़ाता भारत

बहुत साल पहले भारत जवान हुआ करता था , बड़ा स्वाभिमानी था, इंसानियत से झुका रहता था, फिर कुछ लोगो ने भारत को अपने कब्जे में ले लिया, भारत पिटा, कुछ आँसू भी रोया होगा शायद, पर स्वाभिमानी फिर भी था मेरा भारत। फिर उन लोगो को धीरे-धीरे जाने पर मजबूर होना पड़ा , हम … Continue reading लड़खड़ाता भारत

वो पतले कागज की कश्ती

कभी कभी उसे भी अपनी क्षमता पर संदेह होता है, पर वो रुकता नहीं है। कभी कभी उसे भी डर लगता है, पर वो झुकता नहीं है। वो भी निसंदेह सावन की पहली बारिश में नाचना चाहता है, पर इस बार वो सहम के रह जाता है। वो हर बार कुछ नया करना चाहता है, … Continue reading वो पतले कागज की कश्ती

चार दिन खड़गपुर में

चार दिन पहले ही तो खड़ा था खड़गपुर जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर 5 पर, हाथ में दो बड़े बैग और चेहरे पे उससे भी बड़ी मुस्कान थी। जब कैंपस के अन्दर आया, पहला दिन तो खरड़गपुर को समझने में गवाया। दूसरा दिन जब समझ मैं पाया, इसने मुझे बहुत हँसाया। तीसरे दिन मैं मायूस बहुत … Continue reading चार दिन खड़गपुर में