रात

हम प्यार न इतना कर पाते, न तेरे प्रेमी बन पाते। गर कर पाते तो डर-डर के, हाँ, बन पाते तो मर-मर के। तुम मर-डर के इतनी न भाती, जो ये रात बीच मे न आती।

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(अ)धर्म

कितने गुनाह करू मैं रब इस धर्म के वास्ते, चलने दे ना मुझे बस खुद के कर्म के रास्ते। एक रास्ता है धर्म का और एक छोटे तर्क का, बढ़ रहा ये भेदभाव सब प्रभाव है इस कर्क का। माना तूने सोचा था कि धर्म एक स्तम्भ होगा, हमारी मानवता का हूबहु प्रतिबिम्ब होगा। पर … Continue reading (अ)धर्म