रात

हम प्यार न इतना कर पाते, न तेरे प्रेमी बन पाते। गर कर पाते तो डर-डर के, हाँ, बन पाते तो मर-मर के। तुम मर-डर के इतनी न भाती, जो ये रात बीच मे न आती।

Advertisements

नकाब

नकाब तो आपने भी बुने ही होंगे? अरे! शर्माईये मत, बता भी दीजिये, क्या नाम रखा है हमारे नकाब का? दोस्ती? प्यार? या खुदगर्ज़ी?

तुम्हे क्या बताऊँ

कभी खुद से तो कभी दुसरों से, भागता ही जा रहा हूँ बस। तुम्हे क्या बताऊँ, चलना और कितना? भरे जलधि में नाव के जितना। ना राह दिख रही है ना नज़ारे, दिमाग को धड़कता दिल दिख रहा है बस। तुम्हे क्या बताऊँ, देखना मुझे किसको? घने धुंये में ओझल होते खुदको। ना शोर सुनाई … Continue reading तुम्हे क्या बताऊँ

कुल्फी का ठेला

दोपहर का समय था, कच्चे घरों पर रखे छप्पर तबे पे रखी रोटी की तरह तप रहे थे। बूढ़े अंदर इस धूप से बचने के नुस्खे ढूढ़ रहे थे और बच्चे लू को बाहों में भरे गलियों की शैर कर रहे थे। तभी एक कुल्फी का ठेला छोटी - छोटी घंटिया बजाते हुये मिट्टी की … Continue reading कुल्फी का ठेला

चार दिन खड़गपुर में

चार दिन पहले ही तो खड़ा था खड़गपुर जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर 5 पर, हाथ में दो बड़े बैग और चेहरे पे उससे भी बड़ी मुस्कान थी। जब कैंपस के अन्दर आया, पहला दिन तो खरड़गपुर को समझने में गवाया। दूसरा दिन जब समझ मैं पाया, इसने मुझे बहुत हँसाया। तीसरे दिन मैं मायूस बहुत … Continue reading चार दिन खड़गपुर में