ढाई बोरी भर आदमी

प्रथम: ज्ञानी
लाखों देवों से भीख मांग, धरता वो पाँव धरा पे,
मंद बुद्धि वो जग में आता, जननी की विकट कृपा पे।
चिपक मात के आँचल से, नाना प्रकार सुख पाता है,
समझ विचित्र लोगो के हृदय, ढाई बीते में नप जाता है।

बालक है वो, ज्ञानी है, योगी है, सन्यासी है,
सारे मनुज-सुरों से उच्च पद वासी है।
जो बढ़ा और एक उंगल, आकार,
रच लेगा निज-जीवन में प्रलय अपार।

द्वितीय: सर्प
कह ले ये सृष्टि लाख भला, रुकने कहाँ वो वाला है,
उफ़ने कितने सदगुण उर से, पर वो कुपित मनु का लाला है।
बदल लिया दल तेज़ रेंग के, सन्यासी से सर्प हुआ,
कर खूब नये पाषण्ड मलिन, बच्चे से युवक हुआ।

छोड़ सूर्य का तेज़ रोज़, कालिख भरता है अर्ध राति,
नए विषों से डंक सींच, बढ़ता है चंद्र कला भाँति।
पहली कलम की टेक से ही, निज-पराया भाव वो गढ़ता है,
दे दारुण दुःख ब्रम्हाण्ड सभी को, अवगुण खुद में भरता है।

तृतीय: दीमक
आगे धरना उसे एक कदम, विकल पौरुष की ही ओर सही,
टकटकी लगा कर देखता ज्यों, काले बादल को मोर कहीं।
ये पौरुष भी काला है अगर काला तेरा यौवन है,
दान, त्याग, लघु प्रेम बिना काला तेरा जीवन है।

कुछ इस प्रकार, पौरुष की दहलीज पार जो करता वो,
मन में ईर्ष्या, पाप लिये सारे अपकर्म फिर धरता वो।
दीमक सा चिपक मोह में, लक्ष्य विहीन हो जाता है,
धन-मदिरा का पान किये, खुद को राजा बतलाता है।

चतुर्थ: वृद्ध
पकड़े खड़ा वो पौरुष को, अब वृद्ध न उसको होना है,
जिस बल पे अहं बड़ा है, वो बल न उसको खोना है।
अजर नहीं तू मानव रे! तेरा बल भी क्षीर्ण होगा,
परीक्षा महाकाल की ये, क्या तू सर्प उत्तीर्ण होगा?

अब हुआ वृद्ध, तन जर-जर जर के मारे,
काँप रहा लोभी विवेक थर-थर डर के मारे।
ज्ञात तुझे ये शैय्या ही तेरा आखरी सुख होगा,
तू कर न सका निज-नाम जगत में, सदैव तुझे ये दुःख होगा।

पंचम: अन्त
हे मुर्ख! नहीं तू समझ सका काले भैंसे पे काल वही,
तुझे खींच ले जाने यम, बस महाकाल की छांव सही।
यमराज आये स्वयं लेने, यदि है भुजबल तो रोक उन्हें,
कहकर की सत्कर्म किया हूँ, न धूल आँखों में झोंक इन्हें।

एक हुंकार जो दी यम ने-"मुर्ख शीघ्र चल, काल नही तेरा भ्राता",
दांत पीस, नेत्र बंद कर, प्राण ज्योति मृत्यु संग उड़ता जाता।
आगे भैंसे पर धर्मराज, पाछे प्राण घसिटते हैं,
कठिन राह यह मृत्युलोक की, हर ओर नरक ही दिखते हैं।

षष्ठ: सत्य
रे धूर्त मनुज! तू क्यों व्यर्थ में रोता है?
बस काटता विषपूर्ण फूल-फल, जो भूत में बोता है।
तू आया था इस जग में वस्त्र बिहीन,
निज-पापों से निर्मित, कर्म-अधीन।

अब जा रहा न तन पर लिए एक भी चीर,
मृत्यु का सबके तरकस में बस एक ही तीर।
तू राजसुत, तू असुरपूत, तू सर्वशक्तिमान बड़ा,
मृत शरीर हो राख तेरा भर ढाई बोरियो में पड़ा।
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