सूनी कोख़

दर्द, व्यथा सब झेलीं हैं, हर नारी ने माता बनने में,
चीखी, चिल्लाई मैं भी थी, इस खबर को पहले सुनने में।
एक शब्द भी अब न कहना है, वो दर्द मुझे भी सहना है,
सूनी है कोख़ भले मेरी, नारीत्व तो मेरा गहना है।

एक दिन तो काले सूरज से केसरिया किरणें निकलेगीं,
मेरी सूनी गोद में भी लालों की लाली बिखरेगी।
मूक मरण मन देख सदा इस आग में मैं बस तपती हूँ,
आँख मूँद, दिल द्वार खोल हर रोज़ दुआएँ जपती हूँ।

दुआएँ तो लाखों जपते हैं, मंजूर किसी की होती क्या?
निकल गयीं कितनी रातें, ये दुखी आत्मा सोती क्या?
लय मग्न शेरनी की भाँति गहरी नींद में सोना है,
मुझे भी अपने लल्ला को ममता सागर में डुबोना है।

कब मेरी राधा होगी? इस व्यथित भाव में बहती जाती हूँ,
प्यार से गोदी आ जाये जो, हर लली को लोरी गाती हूँ।
मेरा लल्ला ऐसा होगा, वैसा होगा, ये मैंने कभी न सोचा है,
एक लाल तो हो इस आंचल को, ये सोच हर आंसू पोंछा है।

पूरी दुनिया ठीक ही थी, अब अपने घर में मुझको टोका है,
बस लला मांगने गयी थी मैं, फिर क्यों मंदिर पे रोका है?
मंदिर तो है जगह अनोखी, दुखित हृदय संग रहने को,
खरी, खोटी सब एक साथ माटी की मूरत से कहने को।

भगवान दान दो कान दिए, सब कटु बचनों को सुनने को,
किस-किस को मैं रोकूँ रघुवर, हाथ तक कम हैं गिनने को।
उन्ही हाथ जोड़ विनती करती, अब और न मुझको कोसो तुम,
कितनी भी मनहूस बड़ी हूँ, मेरी ममता को न दोषो तुम।

दोष बस मेरा इतना है, एक लाल न पैदा कर पायी,
एक आँसू भी न रोई थी, सब जग की गाली सुन आयी।
छाती चीर गयी प्रियतम, तेरी “बाँझ है तू” पैनी आवाज़,
मृत शैया पर लेट गयी, मेरी जीने की मंशा आज।

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