तितली और तुम

तुम रंग बिरंगा पहने हो, खुद की कालिख से डरते हो? तुम खुश जो इतना दिखते हो, जो मन चाहे वो करते हो? वर्षों मेहनत करके तुमने उस तितली को पकड़ा था, किस जन्नत की चाह में तुमने उसके पंखों को जकड़ा था? वो दूर आकाश की ऊचाईयों तक उड़ती ही बस जाती थी, तुमको … Continue reading तितली और तुम

तुम्हे क्या बताऊँ

कभी खुद से तो कभी दुसरों से, भागता ही जा रहा हूँ बस। तुम्हे क्या बताऊँ, चलना और कितना? भरे जलधि में नाव के जितना। ना राह दिख रही है ना नज़ारे, दिमाग को धड़कता दिल दिख रहा है बस। तुम्हे क्या बताऊँ, देखना मुझे किसको? घने धुंये में ओझल होते खुदको। ना शोर सुनाई … Continue reading तुम्हे क्या बताऊँ