कुल्फी का ठेला

दोपहर का समय था, कच्चे घरों पर रखे छप्पर तबे पे रखी रोटी की तरह तप रहे थे। बूढ़े अंदर इस धूप से बचने के नुस्खे ढूढ़ रहे थे और बच्चे लू को बाहों में भरे गलियों की शैर कर रहे थे। तभी एक कुल्फी का ठेला छोटी – छोटी घंटिया बजाते हुये मिट्टी की पतली सड़क से गुजरता है । जहाँ छोटे बच्चे हाथ में एक या दो रूपये के सिक्के ले कर ठेले के पीछे भाग रहे थे, वहीं कुछ युवक चेहरे पे राहत भरी मुस्कान समेटे धीमी गति से उस ओर बड़ रहे थे।

उसी राह के दूसरे छोर पर, आधे कपड़े पहने बैठे हुये एक बच्चे की निगाहे कुल्फी के ठेले पर जमी हुयी थी । वो बाकी सब बच्चों की तरह माँ से एक रुपया ले कर कुल्फी के ठेले की तरफ क्यों नहीं भाग रहा? जी हाँ वो गरीब है। लेकिन वो कितना मजबूत और समझदार है ये उस मासूम चेहरे और आधे कपड़ो को देख कर बताना मुश्किल है। वो समझता है उस एक रुपये की कीमत, जो दूसरे बच्चे पतली डंडी पर लगी बर्फ पर उडा रहे है। उसने अपनी आँखों से देखा है, उसके पिता एक रुपया कितनी मेहनत से कमाते है। वो अपने वर्षो के अनुभव से ये सीख चुका है कि जब भी वो अपनी माँ से कुल्फी के लिए पैसे मांगता है, तो एक ही जबाब – “बेटा कुल्फी अच्छी नहीं होती है” क्यों मिलता है। वो अपने पिता की आँखों में मजबूर झूट की परछाई को साफ देख सकता है, जब उसके पिता “आज तेरे स्कूल आकर फीस जमा कर दूंगा” कह कर रोज उसे दिलासा दिलाते है। कितनी बार उसने अपनी माँ को अच्छी साड़ी देख कर अपना मन मारते देखा है। अब आचार से सूखी रोटियां खाने में तो उसके चेहरे पर एक सिकन तक न आती है।

ऐसा बच्चा आखिर कुल्फी के ठेले को क्यों देख रहा है? वो ठेले को बिना पलक झपकाये देख कर याद कर रहा है, आखिरी बार जब वो अपने हाथ में लकड़ी पे लगी खोये की कुल्फी को खुशी-खुशी खा रहा था। ये सोचते ही उसकी आँखे चेहरे पे सन्तोष भरी मुस्कान के बंद हो जातीं हैं, मानो हजारों कुल्फ़ियों की ठंडक उसके कलेजे को छू के निकल गयी हो।

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