प्रतिफल

मैं श्वेत रक्त की धारा में सौंदर्य छिड़कने आया हूँ, मैं क्रूर निशा की काया में शोलो सा भड़कने आया हूँ। मैं रुह रौंदता दानव हूँ, मनु-हृदय आंकने आया हूँ। मैं अर्ध बूंद की नमी मात्र से थार सींचने आया हूँ, मैं नग्न त्रिशूल की तेज़ धार से खाई खींचने आया हूँ। मैं पृष्ठ चीरता … Continue reading प्रतिफल

Advertisements

कुल्फी का ठेला

दोपहर का समय था, कच्चे घरों पर रखे छप्पर तबे पे रखी रोटी की तरह तप रहे थे। बूढ़े अंदर इस धूप से बचने के नुस्खे ढूढ़ रहे थे और बच्चे लू को बाहों में भरे गलियों की शैर कर रहे थे। तभी एक कुल्फी का ठेला छोटी - छोटी घंटिया बजाते हुये मिट्टी की … Continue reading कुल्फी का ठेला

कीचड़

दूर दूर तक कीचड़ है, सब और भी उसमे भरते है। एक फूल खिला उस कीचड़ में, सब उस पर ही अब मरते हैं। वो कीचड़ में ही खिलता है, सब इससे भी अब डरते हैं। ऐसा क्या है कीचड़ में जो कीचड़ में ही खिलते तुम? सबके दिल में कीचड़ है, अब कहाँ पे … Continue reading कीचड़