वो पतले कागज की कश्ती

कभी कभी उसे भी अपनी क्षमता पर संदेह होता है, पर वो रुकता नहीं है।
कभी कभी उसे भी डर लगता है, पर वो झुकता नहीं है।
वो भी निसंदेह सावन की पहली बारिश में नाचना चाहता है, पर इस बार वो सहम के रह जाता है।
वो हर बार कुछ नया करना चाहता है, पर एक नया बहाना ही ढूढ़ पाता है बस।
हाँ वो कोई पराया नहीं, मेरा अपना दिल है।

शायद वो डरता है लोगों की गन्दी सोच से, या फिर खौफ खाता है इस बदलाव से।
बदलाव तो प्रकृति का नियम है, पढ़ा था उसने भी कहीं,
तैयार भी है शायद वो इस भयानक सागर में गोते लगाने को के लिए,
खुद पानी से खुन्नस खाये बैठे लोग भी बहुत है बताने को कैसे जाना चाहिये,
बस उसे तलाश है तो सिर्फ एक कश्ती की।

एक ऐसी कश्ती जो सिखाएगी उसे बदलाव के सागर की संकोच भरी लहरों को चीरना,
एक ऐसी कश्ती जो सिखायेगी उसे तपते पानी और ठिठुरती शीतलहर को झेलना,
एक ऐसी कश्ती जो सिखाएगी उसे नंगी आँखों से सागरतल तक देखना,
एक ऐसी कश्ती जो भंवर में उसे घर की याद भी ना आने देगी,
एक ऐसी कश्ती जो उसे दूर से छोटे दिखने वाले विशालकाय ख़ुशी के टापू तक ले जायेगी।

उसे लोहे की मजबूत या लकड़ी की आकर्षक कश्ती नहीं चाहिए,
उसे तो बस बच्चों वाली पतले कागज की एक कश्ती चाहिए,
जो पानी में तेज तो चले पर आगे जाकर टकराये ना,
जो भंमर में गोल गोल भले ही घूमे पर पलट के उसे गिराये ना,
जो बारिश में नम भी हो पर पूरी खुलने पर भी पानी में समाये ना,
शायद ऐसी कश्ती सिर्फ एक सोच हो उस पागल दिल की, पर वो खुश है ऐसी कश्ती के इंतज़ार में।

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2 thoughts on “वो पतले कागज की कश्ती

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